khabre

शनिवार, 27 मार्च 2010

जिन्दगी को दर्शाती हुई ये कविता

आज मुझे एक पुरानी कविता याद आ रही हैं . और आप सबको पेश करना चाहूँगा .
मुझे नही मालूम कि ये किन महाशय कि लिखी हुई हैं फिर भी मै उनका आभारी हूँ  और उनको इसके  लिये धन्यवाद करता हूँ 

1. जिन्दगी को दर्शाती हुई ये कविता 



* इतनी ऊंची मत छोडो कि गिर पड़ोगे जमीन पर
   क्योंकि खुले आसमान में सीढिया नही होती

* मत करो बुढ़ापे में इश्क कि तमन्ना 
    क्योंकि फ्यूज बल्बों में बिजलिया नही होती

* रोज रोज क्यों नहाते हो वजन मत घटाओ 
    वो बदन ही क्या जिसमे खुजलिया नही होती

* ये तो आम जनता हैं चाहे चूष लो जितना
     ये वो आम हैं जिनमे गुठलिया नही होती

* सबको लगानी हैं उस रजिस्टर पे हाजिरी
    क्योंकि मौत वाले दफ्तर में छुट्टिया नही होती 

6 टिप्‍पणियां:

  1. हा...हा...हा..बढिया है..........."

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  2. इतनी ऊंची मत छोडो कि गिर पड़ोगे जमीन पर
    क्योंकि खुले आसमान में सीढिया नही होती

    बहुत खूब ....!!


    * मत करो बुढ़ापे में इश्क कि तमन्ना
    क्योंकि फ्यूज बल्बों में बिजलिया नही होती

    जनाब जिस्म बूढ़े होते हैं दिल नहीं ....!!


    * रोज रोज क्यों नहाते हो वजन मत घटाओ
    वो बदन ही क्या जिसमे खुजलिया नही होती

    मजेदार .....बहुत खूब .....!!

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  3. Some words of Advice from my side also -

    "A kiss is a lovely trick, designed by nature, to stop words when speech becomes superfluous."

    "In real love you want the other person's good. In romantic love you want the other person."

    "Each moment of a happy lover's hour is worth an age of dull and common life."

    "It's so easy, To think about Love, To Talk about Love, To wish for Love, But it's not always easy, To recognize Love, Even when we hold it.... In our hands."

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