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शुक्रवार, 7 मई 2010

तो देख लो इन्होने भी साबित कर दिया की कौन कहता हैं की में ये नहीं कर सकता ?


हमारे बुजुर्गो ने काफी बातें कही हैं अपनी लोकोक्तियो द्वारा.
अगर आज भी हम उनको परखने की कोशिश करे तो  शायद उनमे से अधिकतर अपनी परख पे खरी उतरेंगी .
आपने एक सामान्य हालत में अलग अलग लोगो को अलग अलग तरह से प्रतिक्रिया करते देखा होगा.
मसलन अगर कुछ  मुश्किल आ जाये तो कुछ लोग तो ये कहते हैं की चलो ये भी जीवन का ही एक हिस्सा हैं .
कुछ ये कहते हैं की यार कैसे करू , क्या करू, कुछ समझ में नही आ रहा.
और कुछ ऐसे होते हैं की मुसीबत  से पहले ही घुटने टेक देते हैं और उनकी प्रतिक्रिया कुछ ऐसी होती हैं- मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो,
में किसी से बात नही करना चाहता हूँ.


इनसे अलग भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहते हैं की आने दो मुस्किलो को कुछ ऐसा करते हैं की वो भी देख के शर्मा जायेगी की में किसके गले आन पड़ी हूँ.
वैसे भी किसी ने कहा हैं की मन के हारे हार हैं मन के जीते जीत.
तो हमें इस तरह से जीना चाहिए की हमसे मिलने वालो को भी हम पर गर्व हो .
क्योंकि दोस्तों समय को तो हर हाल में गुजरना ही हैं . फिर चाहे हम उसे हंस के गुजारे या फिर रो- रोकर गुजारे .
जब ऐसा होना ही हैं तो फिर क्यों ना अच्छी तरह से उसके फट्टे चक दे .


"दोस्तों फर्क सिर्फ नजरिये का होता हैं की हम अपना नजरिया कैसे रखते हैं "


इन महाशय का किसी ने मजाक उड़ाया  था की मोटा होने के कारण ये साथ  में  दिखाए हुए जैसा कुछ नही कर सकते .
तो देख लो इन्होने भी साबित कर दिया की कौन कहता हैं की में ये नहीं कर सकता ?

6 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा राणा साहब,"मन के हारे हार है,मन के जीते जीत!"

    कुछ भी कर दिखाने के लिए प्रेरित करती आपकी ये पोस्ट!हालांकि पहली नज़र में मुझे ये हंसा गया था,जब लेख पढ़ा तो थोड़ी शर्म आई,और सही बात पकड़ पाया!

    कुंवर जी,

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  2. कुमार राधारमण जी से सहमत !
    करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान !

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  3. अच्छे विचारों के लिए प्रेरित करती पोस्ट / हर कदम पे बाधाएं हैं ,उनको हटाकर मंजिल पे पहुंचना भी है /

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